Life Reflecter Ravi Ajmeriya

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शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

दास्ताँ अकेलेपन की



अकेलेपन की क्या दास्तां है
खुद पे शुरू खुद पे ही खत्म जहाँ है
ग़मों और दुखों का और फैला समां है
यही प्यार में असफल लोगों की दास्ताँ है
जहाँ जीना बेमानी सा लगता है और मरना भी
यही तो अकेलेपन की क्या दास्तां है
खुद पे शुरू खुद पे ही खत्म जहाँ है

केसे जीता है अकेलेपन में इंसान
बतलाना कठिन सा लगता है
न ही साथ होता है न ही सहारा
और न ही हाथों में हाथ होता है
एक एक रात उसको कालजयी सी लगती है
कभी न खत्म ना होने वाली बात सी लगती है
डरा डरा सा बुझा बुझा सा जब  अपनी जिन्दगी जीता है
भूली बिसरी यादों को जब द्वारा जीता है
अकेलेपन साया उसके उतने करीब होता है
यही तो अकेलेपन की क्या दास्तां है
खुद पे शुरू खुद पे ही खत्म जहाँ है

हर इंसान अधुरा होता  है
पाकर किसी का साथ ही वह पूरा होता है
मगर हर इंसान हाथों के मजबूर होता है
किसी के हाथों में प्यार तो किसी के हाथों में सूनेपन का हार होता है
लेकिन प्यार में डूबा हुआ इंसान तो कच्चे घड़े के सामान होता है
छोटे दुःख और बंधन से वह दुखी होता है
अकेलेपन की तपिश से निकल कर आया इंसान ही सछ इंसान होता है
हर दुःख और दर्द से मनो जैसे अनजान रहता है
यही तो अकेलेपन की क्या दास्तां है
खुद पे शुरू खुद पे ही खत्म जहाँ है

कभी भरी दोपहरी में रुलाता है अकेलापन
कभी तन्हाई की रातों में जगाता है अकेलापन
किसी को क्या एहसास कितना सताता है अकेलापन
कुछ खोने का अब गम नहीं ना पाने की ख़ुशी
जो चाह था वो मिला नहीं की लाख कोशिशें मगर हुआ  हांसिल नहीं
डर तो केवल इस बात का है की कहीं मेरे अस्तित्व को न ही डूबे ये अकेलापन
यही तो अकेलेपन की क्या दास्तां है
खुद पे शुरू खुद पे ही खत्म जहाँ है

माँगा था प्यार तेरा तूने जुदाई दी
चाहा था साथ तेरा तूने बेवफाई दी
मांगी थी खुशियों की बरसात तूने आंसुओं की धार दी
सूनेपन का तोहफा अकेलेपन की सौगात दीयही तो अकेलेपन की क्या दास्तां है
खुद पे शुरू खुद पे ही खत्म जहाँ है

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